आज अगर किसी रेस्तरां में कोल्ड ड्रिंक ऑर्डर की जाए, तो सबसे पहले कोका-कोला या पेप्सी का नाम आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में एक समय ऐसा भी था जब विदेशी कोला ब्रांड्स को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था? एक ऐसा समय जब देसी कोला ब्रांड्स ने भारतीय बाजार पर राज किया था।
यह सिर्फ एक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा नहीं थी, बल्कि यह भारत की आत्मनिर्भरता, स्वदेशी संघर्ष और एक नई कारोबारी सोच की भी कहानी थी। इस सफर में राजनीति भी थी, व्यापारिक चालें भी थीं, और एक ऐसा देसी स्वाद भी था, जिसने लाखों भारतीयों का दिल जीता।
यह कहानी है Campa Cola, Thums Up और Double Seven (77) की, जिनका जन्म एक विशेष राजनीतिक और आर्थिक माहौल में हुआ और जिन्होंने भारतीय बाजार में अपनी अनोखी पहचान बनाई।
तो आइए, खोलते हैं इस ‘भारतीय कोला’ की बोतल और चखते हैं इसके इतिहास का चटपटा और बुलबुलेदार स्वाद !!!
1977: कोका-कोला की विदाई
1970 के दशक में भारत में कोका-कोला का जबरदस्त दबदबा था।छोटे कस्बों की दुकानों से लेकर बड़े रेस्तरां तक, कोका-कोला की बोतलें धड़ल्ले से बिकती थीं। लेकिन 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार आई, तो चीजें अचानक बदल गईं।
नए उद्योग मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने कोका-कोला को निर्देश दिया कि यदि उन्हें भारत में रहना है तो ‘फेरा कानून’ (Foreign Exchange Regulation Act) का पालन करना होगा। इस कानून के अनुसार, विदेशी कंपनियों को भारत में अपने व्यापार का एक बड़ा हिस्सा भारतीय साझेदारों को सौंपना पड़ता था और अपने व्यापारिक रहस्यों को सरकार के सामने उजागर करना पड़ता था।
कोका-कोला जैसी अमेरिकी कंपनी के लिए यह एक असंभव शर्त थी। उनके लिए उनका ‘गुप्त फॉर्मूला’ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी और वे इसे किसी भी हालत में साझा नहीं कर सकते थे। उन्होंने सरकार की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया और भारत से अपना कारोबार समेट लिया।
इसके साथ ही, भारत में कोल्ड ड्रिंक मार्केट में एक बड़ा खालीपन आ गया। लेकिन यह खालीपन ज्यादा समय तक नहीं रहा। भारतीय उद्यमियों और सरकार ने इसे एक मौके के रूप में देखा और अपने-अपने ब्रांड लॉन्च करने की तैयारी शुरू कर दी।
Double Seven: भारत का सरकारी कोला
सरकार ने फैसला किया कि भारतीय बाजार को कोला ड्रिंक्स से खाली नहीं छोड़ा जाएगा। इस उद्देश्य से मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (MFIL) को जिम्मेदारी दी गई कि वह एक नया कोला ड्रिंक तैयार करे, जो पूरी तरह से भारतीय हो।
अब सबसे बड़ी समस्या थी की इस नए ड्रिंक का नाम क्या रखा जाए?
किसी ने सुझाव दिया, “आज़ादी!”
किसी ने कहा, “स्वदेशी कोला!”
लेकिन फिर याद आया कि ये सब बहुत भारी-भरकम नाम हैं। तभी किसी होशियार आदमी ने सुझाया,
“साल 1977 में कोका-कोला बाहर गई थी, तो क्यों न नाम हो ‘Double Seven (77)’!”
इस तरह नए ड्रिंक का नाम Double Seven रखा गया, जिसे 1977 में जनता पार्टी सरकार की ऐतिहासिक जीत और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में देखा गया।
Double Seven का उत्पादन दिल्ली और गाजियाबाद की सरकारी फैक्ट्रियों में किया गया।
कैसा था Double Seven का स्वाद?
अब चूँकि यह सरकार का प्रोजेक्ट था, तो यह सोचना ग़लत नहीं होगा कि इसमें ढेर सारे सरकारी चमत्कार भी थे।
पहला चमत्कार: ‘स्वाद में देसीपन!’
Double Seven (77) में कोका-कोला जैसा पंच नहीं था, इसके स्वाद को भारतीय खान-पान के अनुरूप बनाया गया था। जिससे यह थोड़ी अधिक मीठी थी और मसालेदार भोजन के साथ अच्छी लगती थी।
दूसरा चमत्कार: ‘मार्केटिंग में सरकारी टच!’
सरकार ने इसे एक “राष्ट्रवादी कोला” के तौर पर पेश किया। लोग इसे गर्व से पीते थे, मानो देशभक्ति का जूस हो!
सरकारी दफ्तरों में चाय की जगह Double Seven की बोतलें दिखने लगीं। रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंड्स पर भी Double Seven धड़ल्ले से बिकने लगी।
लेकिन सरकारी उत्पाद होने के कारण इसमें व्यावसायिक सोच और आक्रामक मार्केटिंग की कमी रही। लोग इसे ‘सरकारी कोला’ के रूप में देखने लगे और धीरे-धीरे इसका आकर्षण फीका पड़ने लगा।
Campa Cola: प्योर ड्रिंक्स ने मोर्चा संभाला
जहां Double Seven एक सरकारी पहल थी, वहीं Campa Cola एक भारतीय कंपनी की महत्वाकांक्षी परियोजना थी। इसे 1977 में प्योर ड्रिंक्स ग्रुप ने लॉन्च किया, जो भारत में 1949 से कोका-कोला का आधिकारिक बॉटलिंग पार्टनर था।
जब कोका-कोला भारत से बाहर हुई, तो प्योर ड्रिंक्स ग्रुप के मालिकों को लगा कि वे इस खालीपन को अपने ब्रांड से भर सकते हैं। उन्होंने अपने पुराने बॉटलिंग कारखानों का उपयोग करके Campa Cola को भारतीय बाजार में उतारा।
Campa Cola ने अपने प्रचार में ‘The Great Indian Taste’ जैसे राष्ट्रवादी नारों का उपयोग किया, जिससे यह तेजी से लोकप्रिय होने लगा। इसका स्वाद कोका-कोला से मिलता-जुलता था और इसे उत्तर भारत में खासतौर पर पसंद किया गया। यह जल्द ही एक प्रतिष्ठित ब्रांड बन गया।
Thums Up की मर्दाना एंट्री
1949 में चौहान परिवार द्वारा स्थापित Parle बिस्किट और सॉफ्ट ड्रिंक्स के क्षेत्र में बड़ी कंपनी थी। उनके पास Gold Spot और Limca जैसे लोकप्रिय सॉफ्ट ड्रिंक्स पहले से ही मौजूद थे। जब 1977 में कोका-कोला भारत से गई, तब Parle ने अपना कोला ब्रांड Thums Up लॉन्च किया।
Thums Up का सबसे बड़ा आकर्षण इसका ‘ज्यादा फिज़्ज़ और मजबूत स्वाद’ था। यह विशेष रूप से उन भारतीय उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया था, जिन्हें मसालेदार भोजन के बाद एक तीखा और तेज स्वाद पसंद आता था।
इसे मुंबई, नागपुर, हैदराबाद और बेंगलुरु के बॉटलिंग प्लांट्स में तैयार किया गया। Thums Up की ‘Taste the Thunder’ टैगलाइन और दमदार विज्ञापनों ने इसे युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया।
यह कोल्ड ड्रिंक एक ‘मर्दाना’ ब्रांड बन गई, जिसका मुकाबला करने के लिए विदेशी कंपनियों को भी नाकों चने चबाने पड़े।
गैर-कोला ड्रिंक्स का प्रसार
जहां कोला ड्रिंक्स ने बाजार में दबदबा बनाया, वहीं Parle और अन्य कंपनियों ने गैर-कोला ड्रिंक्स में भी अपनी पकड़ मजबूत बनाई।
Gold Spot संतरे के फ्लेवर वाली एक मज़ेदार और चुलबुली ड्रिंक थी, जो युवाओं के बीच काफी पसंद की जाती थी। Limca एक नींबू-मसालेदार फ्लेवर वाली ड्रिंक थी, जो खासतौर पर गर्मियों में बेहद लोकप्रिय थी।
1980 के दशक में Citra नाम की एक और नींबू मिश्रित कार्बोनेटेड ड्रिंक बाजार में आई, जो 90 के दशक में काफी चर्चित रही।
इसके अलावा, Maaza और Frooti जैसे आम आधारित पेय भी बेहद सफल रहे, जिन्होंने कोल्ड ड्रिंक बाजार को नया आयाम दिया।
पेप्सी की एंट्री
1988 में, पेप्सी ने भारत में प्रवेश करने की सोची। नियमों के अनुसार, कोई भी विदेशी कंपनी तभी निवेश कर सकती थी जब वह भारतीय कृषि और उद्योग को लाभ पहुंचाए। इस चुनौती से निपटने के लिए पेप्सी ने पंजाब सरकार और भारतीय कंपनियों (पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज और वॉल्केन इंडस्ट्रीज) के साथ ‘Pepsi Foods Ltd’ नाम से एक संयुक्त उद्यम बनाया।
इस साझेदारी के तहत पेप्सी ने टमाटर प्रोसेसिंग और आलू की खेती में निवेश करने का वादा किया। हालांकि, सरकार ने उन्हें ‘Pepsi’ ब्रांड इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी, इसलिए 1990 में पेप्सी ने ‘Lehar Pepsi’ नाम से अपना कोला लॉन्च किया। यह देसी कोला ब्रांड्स के लिए पहला झटका था।
‘Lehar Pepsi’ ने आते ही भारतीय युवाओं को आकर्षित कर लिया। 1993 में आर्थिक उदारीकरण के बाद पेप्सी ने अपने भारतीय साझेदारों की हिस्सेदारी खरीद ली और ‘Lehar Pepsi’ को पूरी तरह से ‘Pepsi’ में बदल दिया।
इसके साथ ही, Thums Up और अन्य घरेलू ब्रांड्स के साथ Pepsi की सीधी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।
इस घटना ने भारतीय कोला बाजार में एक नए युग की शुरुआत की।
कोका-कोला की भारत वापसी: बड़ा दांव, बड़ी टक्कर
1993 में कोका-कोला ने भारत में ज़ोरदार वापसी की। लेकिन इस बार वे सिर्फ बाजार में लौटने नहीं, बल्कि पूरी तरह से राज करने आए थे। अपनी रणनीति को मजबूती देने के लिए कोका-कोला ने Parle के लोकप्रिय ब्रांड्स, Thums Up, Limca और Gold Spot का अधिग्रहण कर लिया।
यह एक मास्टरस्ट्रोक था, क्योंकि इससे उन्हें न सिर्फ एक मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क मिला, बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं के बीच पहले से स्थापित भरोसेमंद ब्रांड भी मिल गए।
कोका-कोला की वापसी एक ऐसा जबरदस्त झटका थी जिससे देसी कोला ब्रांड्स कभी उबर ही नहीं पाए।
शीघ्र ही भारतीय कोला बाजार में Pepsi और Coca-Cola के बीच एक जबरदस्त और दोतरफा मुकाबला शुरू हो गया।
इस मुकाबले में देसी कोला ब्रांड्स के लिए कोई जगह नहीं थी !
देसी कोला ब्रांड्स का अंत और पुनर्जन्म
नब्बे के दशक में Double Seven की बिक्री गिरने लगी और 1994 में मॉडर्न फूड इंडस्ट्रीज़ ने इसका उत्पादन बंद कर दिया।
कोका-कोला ने Thums Up को धीरे-धीरे कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन ‘Taste the Thunder’ वाली दमदार इमेज ने Thums Up को भारतीय उपभोक्ताओं से जोड़े रखा। आखिरकार, कोका-कोला ने इसे एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी ब्रांड के रूप में बनाए रखने का फैसला किया।
Campa Cola का उत्पादन 2000-2001 के आस-पास बंद हो गया था। हाल ही में Campa Cola को रिलायंस ने दोबारा लॉन्च किया है।
कुछ लोगों का मानना है कि Double Seven भी दोबारा लांच होना चाहिए।
क्या आपको लगता है कि भारतीय कोला ब्रांड्स दोबारा बाज़ार में धमाल मचा सकती है? अपने विचार हमें कमेंट्स में बताइए!
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नोट: इस पोस्ट के कुछ भाग बनाने में ChatGPT का उपयोग किया गया है।


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